Saturday, February 14, 2015

सावित्री-सत्यवान : जब पहली बार मिले



वैलेन्टाइन-डे विशेष-एक प्रेम कथा
-ज्ञानेन्द्र कुमार
सावित्री-सत्यवान यही दो नाम हैं जो प्यार के प्रतीकों में शुमार नहीं हैं। जीहां, आपने प्रेमी जोड़ों के नाम पर लैला-मजनू, हीर-रांझा और सीरी-फरहाद तो सुन ही रखे हैं मगर आध्यात्मिक नजर से देखें तो सावित्री और सत्यवान भी प्रेम प्रतीक के पर्याय हैं। आज वैलेन्टाइन डे है यानि प्रेम का पर्व। आइए आपको इस प्रेम दिवस पर सावित्री-सत्यवान के प्रेम की कहानी से रूबरू कराते हैं-
प्रेयसी और प्रेमी का एक-दूसरे के प्रति मनमोहक आकर्षण ही प्रेम का पर्याय है। यह वो अवस्था होती है जब प्रेयसी के नयन अपने प्यार को देखते हैं और एक ही नजर में उन्हें यह अहसास हो जाता है कि मेरे मन मंदिर के स्वामी सिर्फ यही हैं। दोनों के प्रथम मिलन पर यह बातें सिर्फ नजरें करती हैं मगर लब (होंठ) शांत रहते हैं। ऐसा अहसास सावित्री को भी पहली बार हुआ जब हिमालय की कंदराओं में बसे गौतमाश्रम में वो सत्यवान से पहली बार मिली। उसका रौबदार गठीला बदन, बिल्कुल वह किसी राजकुमार सा लग रहा था। हो भी क्यों न राजकुमार तो वह था ही मगर यह अलग बात है कि उसके पिता का राजपाट सब छिन चुका था। सावित्री ने सत्यवान को देखा और सत्यवान ने सावित्री को। नजरें झुकाकर फिर उठाकर और फिर नजरें झुकाकर। यह क्रम महज तीन बार ही हुआ होगा और दोनों के ही मन में ऐसी ध्वनि तरंगित हुई मानो यही वह है जिसका युगों से इंतजार था। किसी ने एक-दूसरे से कुछ नहीं कहा मगर सावित्री ने उसी क्षण मन में एक कठोर व्रत (निर्णय) ले लिया कि स्वामी वो तुम ही हो। ऐसा भाव सावित्री के मन में पहली बार उठा। यह प्रेम की व्याकुलता के चरम का समापन था। यह समर्पण का भाव था और यही आत्मिक और मानसिक शांति का भाव भी था। यह असली प्रेम था। यह सच्चा प्रेम था।
मद्र देश के राजा महाराज अश्वपति और महारानी मालविका के 11 वर्ष से कोई संतान न थी, जिससे मालविका उदास रहती थीं और अश्वपति का भी राजकाज में मन नहीं लगता था। उनकी यह बात राजगुरु देवाश्रय और मंत्री यशोधर्म ने भांप ली और उनसे विचार किया। राजप्रसाद (राजसभा) में ज्योतिष मिहिरसेन को बुलाया गया। उन्होंने महाराज को आश्वस्त किया कि उनकी समस्या का हल महर्षि विश्वामित्र के पास मिल सकता है। वह गृह, नक्षत्र और तारों के महाज्ञाता हैं। सभी ने फैसला किया किया और चल पड़े। हिमालय की कंदराओं की किसी गुफा में तपस्यालीन विश्वामित्र ऋषि से मिलने के लिए, उन्होंने कई दिन की यात्रा की। आखिरकार, वे महर्षि विश्वामित्र से मिले और उन्हें पूरी व्यथा बताई। उन्होंने गणना करने के बाद एक संतान का योग बताया तथा चिकित्साशास्त्र की कुछ युक्ति भी सुझाई और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हवन के विधिविधान बताए। तीन माह के बाद आखिरकार मालविका ने गर्भधारण किया। इस खबर से पूरा राजप्रसाद मानो खुशी से झूम उठा। समय बीता और मालविका ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री के जन्म पर पूरे मद्रदेश में खुशियां मनाई गईं।
उधर, शाल्व देश में भी उनके प्रेमी सत्यवान को जन्म हो चुका था, लेकिन जैसे ही सत्यवान चार वर्ष के हुए वैसे ही महाराज द्युमसेन को एक अजीब बीमारी ने घेर लिया। उनकी आंखों की ज्योति स्वत: जाने लगी। इससे महारानी  शैव्या, राजगुरु अग्निशर्मा, मंत्री देवरत सहित पूरा राज परिवार शोक में डूब गया। कुछ समय में ही महाराज की जयोति पूरी तरह क्षीण हो गई। इसका फायदा उठाकर पड़ोसी देश के राजा वीरसेन ने शाल्व पर आक्रमण कर दिया। मंत्री देवरत किसी सुरक्षित स्थान की खोज में राज परिवार को लेकर काफी दूर निकल आए थे। महाराज अब देख नहीं सकते थे तो उन्हें देवरत ने ही सहारा दिया। अब राजपाट सब क्षीर्ण हो चुका था। आश्रय लेने का कोई ठिकाना न था तब मंत्री देवरत ने द्युमसेन को गौतमाश्रम में शरण लेने की युक्ति सुझाई। इस तरह राज परिवार हिरणवन की ओर गौतमाश्रम के लिए प्रस्थान कर गया। महर्षि गौतम चिकित्साशास्त्र के ज्ञाता थे। उन्होंने द्युमसेन की आंखों का उपचार भी शुरू कर दिया। राजकुमार सत्यवान गौतमाश्रम के मुनियों के पुत्रों के साथ खेलने, पढ़ने व बढ़ने लगे।
उधर, सावित्री की कुंडली देखने केबाद ज्योतिष मिहिरसेन ने भविष्यवाणी की कि सावित्री की  शादी के दो साल में ही उसके पति की मौत हो जाएगी। यह बात मद्र से बाहर हर ओर जंगल  की आग की तरह फैल गई। जब सावित्री ने किशोरावस्था से यौवनावस्था की ओर कदम रखे तो राजपरिवार ने उनकी शादी का निर्णय लिया और हर ओर राजघरानों को न्योता भेजा गया मगर कोई भी सावित्री से विवाह करने को तैयार न हुआ क्योंकि शादी के दो वर्ष बाद उसके पति की मौत हो जाएगी, यह बात किसी से छिपी न थी। महाराज शोकाकुल हो गए। उन्होंने राजगुरु से कहा कि क्या उनकी पुत्री कुंआरी ही रह जाएगी? तब राजगुरु ने उन्हें एक युक्ति सुझाई कि महाराज क्यों न हम सावित्री को उसका वर स्वयं वरण करने दें। वैसे भी स्वयंवर की परिपाटी तो राजपरिवारों में रही है। वहां स्त्री जिस वर का वरण करती है, वह उसकी इच्छा से निमित्त होता है न कि कुंडली देखकर। इसके लिए हम सावित्री को तीर्थयात्रा पर भेज देते हैं। यह बात महाराज को समझ आ गई। संयोग से उसी क्षण महाश्वेताश्रम के गुरु महाश्वेत राज्य में पधारे। वे तीर्थयात्रा पर निकले थे। मद्रदेश में पशुपतिनाथ के दर्शन करने के बाद वे अश्वपति से मिले। महाश्वेत को देखकर सावित्री ने स्वत: तीर्थयात्रा की बात रखी और उन्हीं की टोली के साथ वो और राजगुरु देवाश्रय के साथ तीर्थयात्रा पर निकल गई। पुष्करतीर्थ में दान का पुण्य जानकर सावित्री ने मद्र का उत्तराधिकार अपने ही राज्य के शहर वेदपुरी के एक मां-बेटे को दान में दे दिया। आगे महाकाल, तंदुलिकाश्रम और जंबूमार्ग होते हुए वे हिमालय पहुंचे। वहां से स्वत: सावित्री के पग किसी अनजान रास्ते की ओर बढ़ने लगे। राजगुरु के पूछने पर सावित्री ने कहा कि मैं इस रास्ते को जानती हूं, यह मुझे मेरे सत्य की ओर ले जा रहा है। सब आश्चर्यचकित हो गए। जिस पथ पर सावित्री कभी न चली उसे वह भलीभांति कैसे जानती है? सूर्यास्त से पहले जंगलों से होते हुए वे लोग गौतमाश्रम पहुंचे वहां सावित्री ने पहली बार सत्यवान को देखा और दोनों की आंखों ने एक-दूसरे को पहचान लिया। ऐसा लगा जैसे वो सावित्री का ही इंतजार कर रहा था। किसी ने कुछ नहीं कहा मगर दोनों की झुकी और उठी पलकों ने एक-दूसरे से ही बात की। यहां सावित्री को ऐसा लगा कि मानो यात्रा का अंतिम पड़ाव यही हो। वहां से सावित्री मद्र देश चली गई और अपने पिता को सत्यवान से विवाह करने की इच्छा जताई। इसके बाद मद्र का राजपरिवार गौतमाश्रम पहुंचा। तब गौतम ऋषि ने उन्हें बताया कि सत्यवान की कुंडली में अकाल मृत्यु का योग है और वह अब सिर्फ दो वर्ष से कम समय ही जी सकेगा। बावजूद इसके सावित्री ने प्रण ले लिया कि विवाह तो सत्यवान से ही करेगी। आखिरकार, गौतमाश्रम में दोनों का विवाह धूमधाम से किया गया। इस प्रकार सावित्री ने अपने प्रेम को प्राप्त किया। नियत समय पर यमराज आए और सत्यवान के शरीर से प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री ने उन्हें रोका। अपने प्रेम और पतिधर्म का हठ दिखाया। आखिरकार प्रेम की विजय हुई जिसके आगे यमराज को भी झुकना पड़ा। वे सत्यवान को जीवनदान देकर चले गए और युगों-युगों तक सावित्री-सत्यवान को प्रेम गाथाओं के रूप में जीवंत भी कर गए।
-जयश्रीराम