Thursday, June 11, 2015

संगठित उद्योगों के नीचे दबा असंगठित मजदूर

अंतरराष्टÑीय मजदूर दिवस पर विशेष
ज्ञानेन्द्र कुमार
बात 1806 की है जब अमेरिका में लगभग फैक्ट्री व्यवस्था शुरू हुई थी तब फिलाडेल्फिया के जूता कामगारों ने हड़ताल कर दी थी। अमेरिकी सरकार ने इन हड़ताली कामगारों के नेताओं पर साचिश रचने के आरोप में मुकदमे चलाए। इन मुकदमों से यह बात सामने आई कि मजदूरों से 19 या 20 घंटे तक काम कराया जा रहा है। यानि सूर्योदय से सूर्यास्त तक मजदूर काम करते थे। 1827 में भी फिलाडेल्फिया में काम के घंटे 10 करने के लिए निर्माण उद्योग के मजदूरों को एक हड़ताल कराने का श्रेय जाता है। यह मामला इसलिए चर्चा में आया क्योंकि मैकेनिक्स यूनियन आॅफ फिलाडेल्फिया दुनिया की पहली ट्रेड यूनियन मानी जाती है जिसके अधीन मजदूरों ने हड़ताल की थी। वहीं 1834 में न्यूयॉर्क में नानबाइयों की हड़ताल के दौरान वर्किंग मेन्स एडवोकेट नामक अखबार ने छापा था, ‘पावरोटी उद्योग में लगे कारीगर सालों से मिस्र के गुलामों से भी ज्यादा यातनाएं झेल रहे हैं। उन्हें हर 24 में औसत 18-20 घंटे तक काम करना होता है।’ 10 घंटे के कार्यदिवस की मांग ने इन इलाकों में एक आंदोलन का रूप ले लिया। इसी के चलते वॉन ब्यूरेन की संघीय सरकार को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए काम के घंटे 10 करने की घोषणा करनी पड़ी। इसी के साथ विश्व में काम के घंटे 10 करने का संघर्ष शुरू हो गया। जैसे ही यह मांग कई उद्योगों ने मान ली, काम के घंटे 8 करने की मांग शुरू हो गई।
वर्तमान में विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में भी मजदूरों के हितों का अंग्रेजी व्यवस्था के अनुरूप ही ध्यान रखा जाता है मगर अधिकांशत: यह कागज तक ही सीमित रहता है। सच्चाई आज भी वही है जो 1806 में मजदूरों के साथ थी। तब मजदूरों के काम के घंटे सीमित नहीं थे। सरकारी, रक्षा तथा आयुध क्षेत्र में तो मजदूरों के आठ घंटे काम के हितों का संरक्षण हो गया मगर संगठित उद्योगों के बीच असंगठित मजदूरों की जान आज भी घिसट रही है। शहरों में बसे औद्योगिक क्षेत्र में मजदूर आज भी पुरानी व्यवस्था में जीने को मजबूर हैं। फर्क बस इतना है कि आठ की जगह नौ से 12 घंटे तक काम लिया जाता है। यही नहीं बिजली, सेतु जैसे कई सरकारी विभाग हैं जहां मजदूरों को मिलने वाली बीमा जैसी सुविधाओं से भी वंचित रखा जाता है। यह सब ठेका व्यवस्था (आउटसोर्सिंग) पनपने के कारण हुआ है। बिजली निगम के अधीन काम करने वाले ठेका मजदूरों को तो मौत के बाद उचित मुआवजा भी नहीं मिल पाता है। यदि वह गंभीर हो गया तो उसका इलाज उसके लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाती है। बिजली निगम तो संविदा कर्मचारी कहकर पल्ला झाड़ लेती है जबकि अधिकांश ठेकेदार मजदूर के बीमे की रकम गबन कर जाते हैं, यही नहीं मासिक वेतन भी दो से तीन माह तक लटका देते हैं। ऐसी स्थित में ये मजदूर ठगे से खड़े रह जाते हैं।
देश के औद्योगिक क्षेत्रों में कानपुर एक बड़ा नाम है। यहां के औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों की समस्या हमेशा से रही है। बिहार, झारखंड से जीवन यापन करने के नाम पर लोग यहां आ जाते हैं जो कम से कम दाम पर मजबूरी में मजदूरी कर रहे हैं। इन्हें फैक्ट्री मालिकों का बंधक मजदूर भी कहना कुछ गलत न होगा। इन मजदूरों की जरूरत बस इतनी है कि वे घरों से दूर काम करने निकले हैं, कुछ पैसे बनाने निकले हैं, जिससे अपना व अपने परिवार का जीवन यापन कर सकें। इस संपन्न औद्योगिक क्षेत्र में कागजों पर तो मजदूर खूब पूरा पैसा पाते हैं मगर सच्चाई यह है कि चाहे चमड़े का काम हो या फिर रांगा गलाने तथा चुर्री बनाने का ही काम क्यों न हो, यहां मजदूरों की प्रतिदिन की कमाई 2013 तक 60 रुपये थी तथा काम के घंटे नौ थे। इसके ऊपर इन्हें ओवरटाइम भी दिया जाता था, जिसमें न के बराबर रुपये दिए जाते थे मगर इसके लिए ये अधिक समय तक ज्यादा काम करते थे। दुर्भाग्य, अभी तक इन मजदूरों की स्थिति यही है। अब फर्क यह है कि वेतन 100 रुपये तक प्रतिदिन मिलने लगा है। पीतल ढलाई कारखानों में तो छोटे बच्चों से 20 से 50 रुपये प्रतिदिन पर आज भी काम चलाया जाता है। कुछ ऐसी ही हालत अगरबत्ती उद्योग की भी है। यहां अगरबत्ती निर्माण में लगे मजदूरों से 12 घंटे तक काम लिया जा रहा है और पूरा वेतन उन्हें इसलिए नहीं दिया जाता है कि वे अगले दिन काम पर आएं। शरीर के निढाल होने तक मजदूर काम कर रहा है जबकि
उसकी सुविधाओं को परखने का काम करने वाला सरकारी तंत्र कमीशन बटोरकर अपने एसी घरों में चैन से सो रहा है।
मजदूर क्रांति संघर्ष के साक्षी अलेक्जेंडर ट्रैक्सर्नबर्ग लिखते हैं कि पचास के दशक के दौरान लेबर यूनियनों को संगठित करने की गतिविधियों ने आठ घंटे काम की इस नई मांग को काफी बल दिया। यह मांग भी कुछ सुसंगठित उद्योगों ने मान ली। इसके बाद यह आंदोलन अमेरिका के अलावा रूस सहित हर उस जगह प्रचलित हो गया जहां उभरती हुई पूंजीवादी व्यवस्था के तहत मजदूरों का शोषण हो रहा था। यह बात इस तथ्य से सामने आती है कि अमेरिका से पृथ्वी के दूसरे छोर पर स्थित आॅस्ट्रेलिया में निर्माण उद्योग के मजदूरों ने यह नारा दिया, ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे मनोरंजन, आठ घंटे आराम।’ उनकी यह मांग 1856 में मान ली गई। कई राज्य सरकारों ने आठ घंटे के काम का कानून पास करना स्वीकार कर लिया था। अमेरिकी कांग्रेस ने 1868 में यह कानून पारित कर दिया। अमेरिकियों के साथ ही यह कानून देश में भी आ गया। अंग्रेज चले गए, कानून रह गया। समय-समय पर संशोधित भी हुआ। कागजों पर इसके कई ग्राफ बने मगर जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों को उनके हक का लाभ आज भी नहीं मिल पा रहा है।